अमित शाह-नीतीश कुमार की ‘डिनर डिप्लोमेसी’ से सुलझेगा सीटों का मुद्दा?
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2010 से ही 'भोज' और खासकर रात्रि भोज बिहार की राजनीति के केंद्र में है. तब नरेंद्र मोदी बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में हिस्सा लेने पटना पहुंचे थे और नीतीश कुमार ने आखिरी क्षण में उन्हें डिनर का दिया न्यौता रद्द कर दिया था.

गुरुवार को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पटना में पार्टी के नेताओं के साथ लोकसभा चुनाव की रणनीति बनाने के लिए मैराथन बैठक करने वाले हैं. लेकिन निगाहें सीएम नीतीश कुमार के साथ नाश्ते और डिनर पर होने वाली उनकी मुलाकात पर टिकी है.

अब फिर 2010 की ओर लौटते हैं. तब सीएम नीतीश कुमार इसलिए नाराज थे कि डिनर वाले दिन ही बीजेपी ने सभी अखबारों में एक विज्ञापन छापा, जिसमें मोदी के साथ हाथ उठाए उनकी तस्वीर छपी थी. ये लुधियाना की एक रैली की पुरानी तस्वीर थी. इसमें बिहार के बाढ़ में गुजरात सरकार की ओर से मिली मदद का जिक्र था.

नीतीश कुमार ने 2010 के विधानसभा चुनाव के दौरान एनडीए के साथी बीजेपी को साफ कर दिया था कि वह नहीं चाहते कि नेरंद्र मोदी बिहार में चुनाव प्रचार करें. इसके पीछे उनके जेहन में गुजरात दंगों के मद्देनजर मोदी की छवि और खुद को सेक्युलर बनाए रखने की कोशिश थी.

तस्वीर छपने के बाद नीतीश ने न सिर्फ डिनर कैंसिल कर दिया बल्कि पांच करोड़ रूपए चेक भी गुजरात सरकार को वापस कर दिया जो बाढ़ राहत कोष में जमा कराया गया था.

इसके बावजूद गठबंधन 2013 तक टिका रहा. मोदी की पीएम बनाने की तैयारी के बाद नीतीश ने साथ छोड़ दिया और 2015 में धुर विरोधी लालू के साथ हुए. पर ये दोस्ती दो साल भी नहीं टिकी और नीतीश फिर से बीजेपी के साथ हैं.

लेकिन फर्क है. तब नीतीश बिग ब्रदर की भूमिका में थे. अटल-आडवाणी से सीधे बात होती थी. बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व मोदी को बिहार चुनाव से दूर रखने पर राजी हो गया था. लेकिन आज फिजा बदली हुई है.

ये मोदी लहर वाली बीजेपी है. नीतीश बिग ब्रदर की भूमिका में हैं या नहीं इस पर जेडीयू और बीजेपी के बीच खुल कर तकरार हो रही है. अमित शाह के साथ डिनर पर निगाहें इसलिए टिकी हुई है क्योंकि इस बार भी नीतीश बीजेपी से नाराज हैं.

पहली नाराजगी तो बीजेपी के केंद्रीय मंत्रियों और उन सासंदों से हैं जो उनकी पार्टी के मुताबिक उग्र हिंदुत्व की विचारधारा को बिहार में भी आजमाने की कोशिश कर रहे हैं. दंगा फैलाने के आरोपियों से गिरिराज सिंह की मुलाकात पर तो वो सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जता चुके हैं. दिल्ली में हुई जेडीयू कार्यकारिणी में नीतीश ने यहां तक कह दिया कि वो किसी भी कीमत पर सांप्रदायिक राजनीति से समझौता नहीं करेंगे, चाहे इसके लिए सरकार ही कुर्बान न क्यों करना पड़े.

दूसरी नाराजगी लोकसभा सीटों पर तालमेल को लेकर है. बीजेपी नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे रख ज्यादा सीटों पर दावा ठोक रही है. ऐसा करते हुए कई नेताओं ने जेडीयू को उसकी हैसियत भी बताई कि कैसे अकेले चुनाव लड़ने पर पार्टी सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी.

हालांकि नीतीश के पास 2010 की तरह मोल-भाव की ताकत नहीं है. तब वो पाला बदल कर नया गठबंधन बनाने की धमकी दे सकते थे. आज, महज एक साल पहले ही महागठबंधन से अलग हुए नीतीश के पास कोई विकल्प नहीं है. राजद और कांग्रेस पहले ही नो इंट्री का बोर्ड टांग चुकी है.

जेडीयू राजनीतिक सच्चाई के बोझ से दबती हुई नजर आती है. बिहार की राजनीति में बीजेपी, राजद और जेडीयू का त्रिकोण अहम है और किसी भी दो दलों का गठबंधन चुनाव में क्लीन स्वीप कर सकता है. इसलिए जेडीयू के पास अकेले चलने का कोई रास्ता नहीं है.

पर जेडीयू नीतीश की विश्वसनीयता और सुशासन बाबू की छवि को आगे रख बीजेपी के साथ मोल भाव कर रही है. सीटों के बंटवारे पर केसी त्यागी ने स्पष्ट किया कि अभी अमित शाह जी की तरफ से कोई ऑफर नहीं आया है.

माना जा रहा है कि गुरुवार के डिनर पर ये मुद्दा उठेगा. दोनों तरफ की नरमी ऑल इज वेल का संकेत दे रही है. किसके चेहरे को बिहार में आगे रखा जाए इस पर दो दिन पहले ही पटना आए संबित पात्रा ने संकेत दे दिया कि यहां नीतीश सीएम हैं और वो स्वाभाविक तौर पर एनडीए के नेता हैं.

बीजेपी भी सीटों के चक्कर में न फंस कर फिर एक बार मोदी सरकार के नारे पर फोकस कर रही है. बीजेपी के एक बड़े नेता ने न्यूज18 से कहा कि दोनों तरफ से बलिदान करना पड़ेगा. बीजेपी भले ही अकेले 2014 में 22 सीटें जीती हो लेकिन इस बार वो इससे कम सीट पर लड़ेगी , ऐसा बीजेपी भी मन बना चुकी है.

लेकिन अंतिम फैसला नीतीश और बीजेपी शीर्ष नेतृत्व को ही करना है. तो गुरुवार का डिनर अहम है.


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