OPINION: प्रियंका गांधी के जरिए कांग्रेस की नजर बीजेपी के परंपरागत वोटबैंक पर
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(अमिताभ अग्निहोत्री)

प्रियंका गांधी कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में आएं इसकी मांग तो डेढ़ दो दशक से तो चल ही रही थी, खास तौर पर अमेठी, रायबरेली से यह मांग बहुत मुखर हो कर कुछ-कुछ अंतराल से आती रही. देश भर से भी ये मांग आती रही कि कांग्रेस कार्यकर्ता चाहते रहे कि प्रियंका गांधी राजनीति में आएं, लेकिन प्रियंका गांधी ने राजनीति में आने की अपनी इच्छा नहीं जताई और कांग्रेस में आने पर अपनी सहमति नहीं दी. फिर पीढ़ी परिवर्तन हुआ और राहुल गांधी के हाथ में कांग्रेस की कमान आ गई.

तब भी यह धारणा थी कि प्रियंका राजनीति में नहीं आना चाहती ताकि फोकस डायवर्ट न हो या फिर राहुल के औरे में बंटवारा न हो, लेकिन अब जब कांग्रेस एक बड़ी लड़ाई के मुहाने पर है तो मुझे लगता है कि प्रियंका गांधी का राजनीति में आने का फैसला एक बड़ा कदम है. जनता में यह फैसला किस ढंग से लिया जाएगा, यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा, लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह जरूर आ जाएगा क्योंकि प्रियंका गांधी की जो शैली है वह सबको जोड़ कर चलने वाली समावेशी शैली है. दूसरा प्रियंका गांधी के पास जो प्लस प्वाइंट है जो उनकी अपील को और बड़ा करता है वह है कि भारत का एक बड़ा वर्ग उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखता है कहीं-कहीं. एक साम्यता चेहरे-मोहरे से भी है.

तो वे लोग जो 50 साल से ऊपर के हैं जिन्होंने इंदिरा गांधी को देखा है उन लोगों से प्रियंका इस कारण से भी जुड़ती है. एक और चीज जो मुझे लगती है कि प्रियंका गांधी संभवतः रायबरेली से चुनाव भी लड़े क्योंकि सोनिया गांधी खुद को धीरे-धीरे राजनीतिक तौर पर सक्रिय भूमिका से अलग कर रही हैं. पहले उन्होंने कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ा. उसके बाद अब अगर सोनिया जी ने यह फैसला किया कि वे चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं तो तय जानिए कि प्रियंका रायबरेली से प्रत्याशी होंगी. फिरोज और इंदिरा के बाद सोनिया की परंपरागत सीट प्रियंका को मिल जाएगी.

इसके अतिरिक्त प्रियंका गांधी को राहुल गांधी ने महासचिव बनाते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया है. इससे यह भी संदेश जाता है कि यूपी राहुल गांधी की प्राथमिकता सूची में कहां पर है. देखिए प्रियंका गांधी पूरब की इंचार्ज और ज्योतिरादित्य सिंधिया पश्चिम की इंचार्ज. यानी दो बड़े कद्दावर और युवा चेहरों को राहुल ने यूपी को दिया है. इससे युवाओं और महिलाओं में भी सही संदेश जाएगा. इनके बीच पार्टी अपनी अपील बढ़ा पाएगी. अपील कितनी बढ़ेगी यह तो बाद की बात है.

एक चीज जिसका कांग्रेस के सूत्र भी संकेत दे रहे हैं कि प्रियंका गांधी के फोकस में तो उत्तर प्रदेश रहेगा, लेकिन वे कांग्रेस के लिए देश भर में कैंपेन करेंगी. मुझे लगता है कि प्रियंका गांधी की सबसे बड़ी उपयोगिता है उनकी मास अपील. उसका फायदा कांग्रेस बहुत बड़े फलक पर उठाना चाहेगी. तो कश्मीर से कन्याकुमारी, और असम से गुजरात तक प्रियंका गांधी कैंपेन करती नजर आएंगी.

इस पूरे प्रसंग में एक नया आयाम यह भी आता है कि सपा, बसपा के गठबंधन और बीजेपी में भी, इन दोनों पर प्रियंका के आने के बाद क्या असर पड़ेगा. मुझे लगता है कि गठबंधन और कांग्रेस के बीच एक रणनीतिक समझौता जरूर होगा. वह भले ही घोषित न हो, अघोषित सामंजस्य जरूर बनेगा. प्रियंका गांधी और कांग्रेस की रणनीति यह होगी कि जो बीजेपी का परंपरागत मतदाता है, उसमें सेंधमारी की जाए. इस बात का अहसास गठबंधन को भी होगा कि प्रियंका गांधी और गठबंधन टकराए नहीं, ऐसा मुझे लगता है. मायावती और अखिलेश यादव में भी इतनी राजनीतिक समझ होगी.


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