राहुल और गायत्री में से किसी एक की दांव पर होगी प्रतिष्ठा
राहुल गांधी और अखिलेश यादव के एक दूसरे से टच में बने रहने की खबर लगातार चर्चाओं में हैं।


अमेठी : यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) के अखिलेश गुट और कांग्रेस में गठबंधन तय माना जा रहा है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव के एक दूसरे से टच में बने रहने की खबर लगातार चर्चाओं में हैं। ऐसे में अमेठी में राहुल या गायत्री में से किसी एक की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। अखिलेश अगर अपने गुट की ओर से अमेठी सीट कांग्रेस के लिए छोड़ते हैं, तो उनके समर्थक और कांग्रेस प्रजापति की राह में कांटे बिछाने की पूरी कोशिश करेंगे। ऐसे में प्रजापति की सियासी प्रतिष्ठा धूमिल हो सकती है। वहीं अगर कांग्रेस अपनी ओर से यह सीट अखिलेश गुट को देती है तो राहुल बिना पार्टी प्रत्याशी खाली हाथ रह जाएंगे। 

कुल मिलाकर या तो राहुल के हाथ से कांग्रेसी गढ़ जाएगा, या पैर छूकर सपा के राष्ट्रीय कैडर के नेता बनने वाले गायत्री प्रजापति का सियासी आंगन। वैसे यहां दोनों के लिए चुनौती है। देखा जाए तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रत्याशी के रूप में स्मृति ईरानी की अमेठी में इंट्री क्या हुई, यहां की सियासत का केन्द्र दो रुख में बट गया। इससे पहले यहां कांग्रेस का सियासी राज कायम था। सांसद राहुल और बहन प्रियंका का यहां ग्लैमर चलता था। लेकिन ईरानी ने विरासत, रियासत और इमोशनल ब्लैकमेलिंग की राजनीति करने वालों को धूल चटाते हुए कुछ दिनों में ऐसा असर छोड़ा कि पौने चार लाख से जीत दर्ज करने वाले राहुल गांधी मुश्किल से एक लाख की जीत दर्ज करा सके। ये भी तब सम्भव हुआ जब भाई राहुल की जीत के लिए बहन प्रियंका ने अमेठी में डेरा डाला और जमकर कैम्पेनिंग की। 

अमीता सिंह के लिए दोहरा सकती है 2012 की स्थिति रियासत की बात करें तो अमेठी विधानसभा क्षेत्र की जनता का मन रियासत की राजनीति करने वालों से भी भर चुका है। विधानसभा चुनाव 2002 में रियासत की ओर से भाजपा के टिकट पर आई प्रत्याशी को अमेठी के वोटर्स ने 55949 वोट किए और जिताकर भेजा। वहीं 2007 में कांग्रेस के बैनर तले आने पर भी उन्हें 48108 वोट किया और जिताया। लेकिन दो बार जीत दर्ज कराने के बाद भी अमेठी के वोटर्स का भला नहीं हो सका, प्रत्याशी पर रियासत का खुमार चढ़ा रहा। नतीजतन 2012 में वोटर्स ने दो चुनावों की कसर उतारा, 49674 वोट में रियासती प्रत्याशी सिमट कर रह गया। वोटर्स ने प्रजा में से चुनकर उसे उस गद्दी पर बिठाया जहां कभी रियासत का नुमाइंदा बैठा करता था। 

सूत्रों की मानें तो एक बार फिर पूर्व मंत्री अमीता सिंह अमेठी में एक्टिव हैं पर जैसा कहा जा रहा है कि दूसरे दल से परिवार का व्यक्ति बिगुल बजा सकता है। अगर ये हुआ तो 2012 वाली स्थिति फिर से दोहराई जा सकती है। अग्नि परीक्षा होगा गायत्री प्रजापति के लिए 2017 का विधानसभा चुनाव अमेठी के वोटर्स का ये दुर्भाग्य ही है कि 2012 में प्रजा की ओर से उसने गायत्री प्रजापति को 58434 वोट देकर जीत का सेहरा उनके सर बाधा। इससे पूर्व 2002 के विधानसभा चुनाव में गायत्री प्रजापति सपा के बैनर तले मैदान में थे तब उन्हें 21764 वोट पाकर संतोष करना पड़ा था। वहीं 2012 में पहली बार की जीत को गायत्री प्रजापति पचा नहीं सके, उन्होंने भी अमेठी के वोटर्स से वही छलावा किया, जो पूर्व में जनप्रतिनिधियों ने किया। फिलवक्त गायत्री प्रजापति मुलायम सिंह यादव का पैर छूकर आर्शीवाद पाते हुए कैबिनेट मंत्री से लेकर सपा के राष्ट्रीय कैडर में जगह पा चुके हैं। लेकिन 2017 का विधानसभा चुनाव उनके लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। 


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